प्रेम का अंजाना सफर – भाग 8

 सुबह का समय था। हल्की-हल्की धूप खिड़की से कमरे में फैल रही थी। शहर धीरे-धीरे अपनी रफ्तार पकड़ रहा था, लेकिन आकाश और आरुषि के जीवन में एक अलग ही ठहराव था—एक ऐसा सुकून, जो लंबे समय बाद आया था।

आरुषि खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। हवा में हल्की ठंडक थी, और उसके चेहरे पर एक शांत भाव था। पिछले कुछ दिनों में उसके जीवन में बहुत कुछ बदल गया था—डर, उम्मीद, और अब एक नई शुरुआत की चाह।

आकाश ने धीरे से पीछे से आकर उसका हाथ थाम लिया।


“आज तुम बहुत खोई हुई लग रही हो,” उसने नरम आवाज़ में कहा।

आरुषि ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।

“मैं सोच रही हूँ… क्या मैं सच में इस नई जिंदगी के लायक हूँ?”

आकाश ने उसका हाथ मजबूती से पकड़ लिया।

“तुम सिर्फ इसके लायक नहीं हो, आरुषि… तुमने इसे कमाया है।”

ये शब्द सुनकर आरुषि की आँखों में हल्की नमी आ गई, लेकिन यह डर की नहीं, सुकून की थी।

दोनों ने साथ बैठकर नाश्ता किया। चाय की भाप उठ रही थी, और रसोई में एक घरेलूपन का एहसास था, जो आरुषि के लिए नया था। कभी वह सुबहें सिर्फ तनाव और भागदौड़ में बिताती थी, लेकिन आज हर पल में एक अपनापन था।

लेकिन जिंदगी हमेशा शांति से नहीं चलती।

दोपहर होते-होते आरुषि के फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया। उसने कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखा, फिर धीरे से फोन उठा लिया।

“आरुषि…” दूसरी तरफ से भारी आवाज़ आई, “तुम भूल गई हो क्या तुम कहाँ से आई हो?”

उस आवाज़ को सुनते ही आरुषि का चेहरा बदल गया। उसके हाथ कांपने लगे।

“मैं… मैं उस जिंदगी को पीछे छोड़ चुकी हूँ,” उसने धीमे स्वर में कहा।

“इतना आसान नहीं होता,” दूसरी तरफ से जवाब आया और कॉल कट गई।

आरुषि कुछ देर तक खड़ी रही। उसके चेहरे पर डर साफ झलक रहा था। आकाश ने तुरंत समझ लिया कि कुछ गलत हुआ है।

“क्या हुआ?” उसने पास आकर पूछा।

आरुषि ने कुछ नहीं कहा, बस फोन उसकी ओर बढ़ा दिया।

आकाश ने नंबर देखा, फिर शांत स्वर में बोला—
“ये लोग तुम्हें डराना चाहते हैं।”

“लेकिन वे रुकेंगे नहीं,” आरुषि ने चिंता से कहा।

आकाश कुछ पल चुप रहा। फिर उसने दृढ़ता से कहा—

“और हम भी नहीं रुकेंगे।”

उस दिन उसने एक फैसला लिया। वह आरुषि को शहर की भीड़ से दूर ले गया—गोदावरी नदी के किनारे एक शांत जगह पर। हवा में हल्की नमी थी, और पानी की आवाज़ मन को सुकून दे रही थी।

दोनों नदी किनारे बैठ गए।

“तुम डरती हो?” आकाश ने पूछा।

आरुषि ने नदी की ओर देखते हुए कहा—

“डर अब भी है… लेकिन अब अकेलापन नहीं है।”

आकाश ने उसकी ओर देखा।

“यही सबसे बड़ी ताकत है।”

कुछ देर दोनों चुप रहे। पानी की लहरें किनारे से टकरा रही थीं, जैसे समय खुद धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हो।

फिर आकाश ने अपने बैग से एक स्केचबुक निकाली और आरुषि को दी।

“ये क्या है?” उसने हैरानी से पूछा।


“तुम्हारी नई शुरुआत,” आकाश ने मुस्कुराते हुए कहा। “तुम हमेशा कपड़ों के डिजाइन बनाना चाहती थी। अब समय है कि तुम खुद को फिर से खोजो।”

आरुषि ने स्केचबुक खोली। अंदर कुछ बेसिक डिजाइनों के आइडियाज थे। उसके चेहरे पर पहली बार असली खुशी झलकी।

“तुम सच में मुझ पर भरोसा करते हो?” उसने धीरे से पूछा।

आकाश ने बिना झिझक कहा—

“खुद से भी ज्यादा।”

ये शब्द आरुषि के दिल में गहराई तक उतर गए।

उस शाम वे दोनों वापस लौटे। शहर की रौशनी धीरे-धीरे जल रही थी, और हवा में हल्की ठंडक थी।

लेकिन घर पहुँचते ही माहौल बदल गया।

दरवाज़े के पास एक लिफाफा पड़ा था।

आरुषि ने उसे उठाया। उसके हाथ थोड़ा कांप रहे थे।

उसने धीरे से लिफाफा खोला।

अंदर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“तुम्हारा नया जीवन इतना आसान नहीं होगा।”

आरुषि का चेहरा उतर गया।

आकाश ने लिफाफा देखा और कुछ पल चुप रहा। फिर उसने शांत लेकिन मजबूत आवाज़ में कहा—

“जो भी होगा… हम मिलकर सामना करेंगे।”

आरुषि ने उसकी तरफ देखा। पहली बार उसके चेहरे पर डर के साथ-साथ भरोसा भी था।

“क्या तुम सच में मेरे साथ रहोगे, चाहे कुछ भी हो?” उसने पूछा।

आकाश ने बिना देर किए कहा—

“हर हाल में।”

उस रात आरुषि देर तक सो नहीं सकी। उसके मन में पुराने डर और नए सपने दोनों लड़ रहे थे। लेकिन इस बार एक फर्क था—वह अकेली नहीं थी।

आकाश उसके पास ही बैठा रहा, जब तक वह शांत नहीं हो गई।

और उस पल उसे समझ आया कि प्यार सिर्फ खूबसूरत लम्हों का नाम नहीं है, बल्कि उस हाथ का नाम है जो मुश्किल समय में भी नहीं छोड़ता।

अगली सुबह, आरुषि ने एक फैसला लिया।

उसने स्केचबुक खोली और पहला डिजाइन बनाना शुरू किया।

उसकी उंगलियाँ कागज़ पर चल रही थीं, और उसके चेहरे पर एक नई चमक थी।

आकाश उसे देख रहा था और मुस्कुरा रहा था।

क्योंकि वह जानता था—

यह सिर्फ एक नई सुबह नहीं थी… यह एक नई जिंदगी की शुरुआत थी।

और “प्रेम का अंजाना सफर” अब डर से नहीं, बल्कि हिम्मत और साथ से आगे बढ़ रहा था।

अध्याय समाप्त |


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