पुणे की प्रेम कहानी – भाग १
पुणे की हर गली, हर मोड़, हर चौराहे पर प्यार की एक कहानी छुपी है। कभी बारिश में भीगती सड़कों पर, तो कभी फर्ग्युसन कॉलेज की पुरानी इमारतों के साये में। ये कहानी है आयुष और मीरा की। आयुष एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, जो हैदराबाद से पुणे आया था।
उसे शहर की धूप, वहाँ की चाय, और शाम को एफसी रोड पर घूमने का शौक था। मीरा एक कला शिक्षिका थी, जो बालेवाड़ी के एक स्कूल में पढ़ाती थी। उसकी आँखों में एक अलग चमक थी, जैसे पुणे के पुराने घरों की खिड़कियों से झाँकती धूप। मुलाकात हुई तो बड़ी अनोखी थी। आयुष को एक प्रोजेक्ट के लिए शनिवार वाड़ा की तस्वीरें लेनी थीं।
वहाँ पहुँचकर वह अपना कैमरा निकाल ही रहा था कि उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह लड़की एक स्केचबुक लिए बैठी थी, शनिवार वाड़ा का एक कोना उकेर रही थी। उसके हाथों में पेंसिल थी, और उसके चेहरे पर शांति। आयुष ने सोचा, “काश मैं इस पल को कैद कर पाता।” उसने धीरे से कैमरा उठाया और उस लड़की की तस्वीर लेने की कोशिश की। लेकिन ठीक उसी पल लड़की ने सिर उठाया। उसकी निगाहें कैमरे से मिल गईं। “अरे!” वह चिल्लाई, “आप मेरी फोटो ले रहे हैं?” आयुष शरमा गया।
“मा… माफ़ कीजिए, मुझे लगा आप बहुत खूबसूरत लग रही थीं, और ये स्केच… मैं इसे कैद करना चाहता था।” लड़की ने थोड़ी नाराज़गी दिखाई, लेकिन उसकी आँखों में हल्की हँसी थी। “तो आप कैमरे से मेरी तस्वीर लेकर क्या करेंगे?” “वो… उसे फ्रेम करके रखूँगा। शायद अपने कमरे में।” “बड़े शौक़ीन हो आप,” उसने कहा और फिर से स्केचबुक पर ध्यान दिया। आयुष ने हिम्मत जुटाई। “क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ? मेरा नाम आयुष है।” “मीरा। और मैं आर्टिस्ट हूँ। बस इतना ही काफी है।” लेकिन आयुष ने हार नहीं मानी। वह अगले दिन फिर शनिवार वाड़ा गया। उम्मीद थी कि मीरा वहाँ मिलेगी। और वह मिली।
इस बार वह एक अलग कोने में बैठी थी, लाल किले का पुराना गेट बना रही थी। “फिर मिल गए आप?” मीरा ने कहा, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में गर्माहट थी। “मैं यूँ ही… टहल रहा था,” आयुष ने झूठ बोला। “हाँ-हाँ, टहलना बहुत ज़रूरी है। खासकर उस जगह पर जहाँ कल एक अजनबी ने आपकी फोटो ली हो।” दोनों हँसने लगे। वह पहली हँसी थी, जो बीज बनकर प्यार में बदलनी थी। उसके बाद हर शनिवार को वे शनिवार वाड़ा में मिलने लगे। मीरा स्केचिंग करती, आयुष फोटोग्राफी। फिर वे पास की एक चाय की दुकान पर चले जाते, जहाँ बूढ़ा काका चाय बनाता था। वहाँ बैठकर वे घंटों बातें करते—जीवन, कला, सपने, और वो सब कुछ जो दिल में था। एक दिन आयुष ने कहा, “मीरा, मैं तुम्हारे बारे में सोचे बिना नहीं रह पाता। हर तस्वीर में तुम नज़र आती हो। हर गली में तुम्हारी याद है।” मीरा ने चाय का कप पकड़े हुए कहा, “तुम मुझे पागल कह सकते हो, लेकिन मैंने भी तुम्हारे बारे में कई स्केच बनाए हैं। तुम कभी पॉज़ देते हो, तो कभी बिना बताए चले जाते हो। मैं तुम्हें अपने स्केचबुक में कैद कर रही हूँ।” “तो तुम मुझे पसंद करती हो?”
आयुष ने पूछा, उसकी आँखों में उम्मीद थी। मीरा ने सिर हिलाया, “हाँ, बहुत। लेकिन डर लगता है। प्यार में कभी-कभी बहुत दर्द होता है।” “मैं वादा करता हूँ, मैं तुम्हें कभी दर्द नहीं दूँगा। बस मुझे एक मौका दो।” मीरा ने अपना हाथ बढ़ाया, आयुष ने उसे थाम लिया। उस पल पुणे की हवा में एक नया रंग घुल गया। वे रोज़ मिलने लगे। कभी कमला नेहरू पार्क में, तो कभी पाषाण चौक पर। आयुष मीरा को केक रोड से केक लाकर देता, मीरा उसके लिए घर का बना मिसल पाव लाती।
वे साथ में बारिश में भीगते, साथ में धूप में बैठते। लेकिन खुशियों के बाद परीक्षा का समय आना ही था। आयुष को एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला—उसे बेंगलुरु ट्रांसफर होना था। दो साल का कॉन्ट्रैक्ट। उसने मीरा को बताने की हिम्मत नहीं जुटाई। उसे डर था कि मीरा उसे छोड़ देगी। एक शाम वे फिर शनिवार वाड़ा में बैठे थे। मीरा उस दिन चुप थी। आयुष ने पूछा, “क्या हुआ?” “आयुष, मुझे पता है।
तुम बेंगलुरु जा रहे हो। तुम्हारे दफ्तर में मेरी एक जान-पहचान है, उसने बताया।” आयुष ने आँखें झुका लीं। “मीरा, मैं तुम्हें बताने वाला था। लेकिन मुझे डर लगा कि तुम…” “तुम्हें डर लगता है तो मुझे भी लगता है। लेकिन प्यार में डर को जगह नहीं होती, आयुष। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।
हर दिन, हर रात, हर साल।
बस तुम वापस आना।” आयुष की आँखों में आँसू थे। उसने मीरा का हाथ पकड़ा और कहा, “मैं वापस आऊँगा। तुम्हारे लिए ही वापस आऊँगा। ये पुणे हमारी कहानी का शहर है, और मैं इसे अधूरा नहीं छोड़ूँगा।” वे चुपचाप बैठे रहे, जब तक शाम ढल न गई। पुणे का लाल-सुनहरा आसमान देख रहा था—एक प्रेम कहानी का पहला भाग, जो अभी लिखा जा रहा था।
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