पुणे की प्रेम कहानी – भाग 4
पुणे की बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। शहर की सड़कें चमक रही थीं और कोंढवा की उस छोटी सी बालकनी से आरव बाहर देख रहा था। तीन महीने बीत चुके थे भाग 3 के उस रात से, जब रिया ने उसे "मैं तुम्हें प्यार करती हूँ" कहा था। लेकिन प्यार कहने भर से कहानी पूरी नहीं हो जाती। असल जिंदगी में तो चुनौतियाँ शुरू होती हैं।
आरव अब एक छोटी आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट लीड बन गया था। काम का प्रेशर बढ़ गया था। रिया अभी भी अपनी मार्केटिंग जॉब में व्यस्त थी, लेकिन अब दोनों की मुलाकातें कम हो गई थीं। वीकेंड पर भी एक-दूसरे को सिर्फ़ कॉल पर सुन पाते थे। फिर भी, हर रात 11 बजे उनका फोन कॉल अनिवार्य हो गया था।
"आरव, कल ओफिस के बाद शिवाजी नगर स्टेशन के पास मिलते हैं? मैं कुछ खास लाना चाहती हूँ," रिया ने एक शाम फोन पर कहा।
"क्या खास?" आरव ने मुस्कुराते हुए पूछा।
"सरप्राइज। बस आना।"
अगले दिन शाम सात बजे शिवाजी नगर स्टेशन के बाहर भीड़ में आरव खड़ा था। बारिश रुक चुकी थी, लेकिन हवा में नमी थी। अचानक उसने देखा—रिया सफेद सलवार सूट में, बाल खुले, हाथ में एक छोटा सा गिफ्ट बैग लिए आ रही थी। उसकी मुस्कान देखते ही आरव का थकान भरा दिन गायब हो गया।
"ये क्या है?" आरव ने बैग लेते हुए पूछा।
"खोलो ना।"
अंदर था एक छोटा सा नोटबुक। पहले पन्ने पर लिखा था— "हमारी पुणे डायरी। हर वो पल, जो हमने साथ बिताया।"
आरव ने पन्ने पलटे। पहली मुलाकात का स्केच, लॉ कॉलेज के बाहर की वो चाय की टपरी, फर्ग्यूसन कॉलेज के गार्डन, ओशो पार्क की वो शाम, और उस रात की बारिश... सब कुछ रिया ने अपने हाथों से लिखा और ड्रॉ किया था। आखिरी पन्ने पर लिखा था— "अगला चैप्टर तुम लिखोगे?"
आरव की आँखें नम हो गईं। उसने रिया को गले लगा लिया। स्टेशन की भीड़ में दोनों एक-दूसरे में खो गए।
"रिया, मैंने सोचा था... शायद हम बहुत जल्दी आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन अब लगता है, तुम्हारे बिना समय रुक जाता है," आरव ने धीरे से कहा।
रिया ने सिर उठाकर उसे देखा, "तो फिर आगे बढ़ते हैं ना। धीरे-धीरे, लेकिन साथ-साथ।"
उस शाम दोनों ने पुणे की पुरानी सड़कों पर घूमने का फैसला किया। कोरेगांव पार्क की ओर बाइक पर निकले। रिया पीछे बैठी, अपनी ठोड़ी आरव के कंधे पर टिकाए। हवा में गुलमोहर की महक थी।
"आरव, तुम्हें कभी डर लगता है?" रिया ने अचानक पूछा।
"किस बात का?"
"कि ये सब सच नहीं होगा। कि कल कोई न कोई रुकावट आ जाएगी।"
आरव ने बाइक साइड में रोकी। एक शांत जगह थी। उसने रिया का हाथ थामा।
"लगता है। लेकिन फिर सोचता हूँ—अगर डर के मारे हम रुक गए, तो वो पल जो आज हम जी रहे हैं, वो कभी नहीं आएंगे। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।"
रिया मुस्कुराई। "तो फिर वादा करो। चाहे जॉब हो, फैमिली हो, या कोई भी प्रॉब्लम, हम कम्युनिकेट करेंगे।"
"वादा," आरव ने कहा और उसके माथे को चूमा।
अगले कुछ हफ्तों में कहानी में नया ट्विस्ट आया। रिया की कंपनी ने उसे मुंबई ट्रांसफर का ऑफर दिया। अच्छी पोस्ट, ज्यादा सैलरी। घर पर भी उसके पेरेंट्स खुश थे। लेकिन रिया का मन नहीं मान रहा था।
एक शाम उसने आरव को फोन किया, "आज मेरे घर आओ। मम्मी-पापा से मिलना है।"
आरव घबरा गया। "अब? इतनी जल्दी?"
"हाँ। क्योंकि मैंने फैसला कर लिया है।"
आरव ने सूट पहना, कुछ मिठाई ली और रिया के घर कोंढवा पहुँचा। रिया के पापा रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर थे। सख्त नजर आते थे। मम्मी ने चाय बनाई। बातें शुरू हुईं।
"बेटा, तुम क्या करते हो?" अंकल ने पूछा।
आरव ने सब बताया। फिर रिया ने कहा, "पापा, मैं मुंबई नहीं जाना चाहती।"
अंकल चौंक गए। "क्यों? इतना अच्छा ऑफर है।"
"क्योंकि... क्योंकि आरव यहाँ है। और मैं पुणे छोड़कर नहीं जाना चाहती।"
माहौल में खामोशी छा गई। अंकल ने आरव को घूरा। "तुम दोनों कितने दिनों से जानते हो?"
"लगभग सात महीने," आरव ने जवाब दिया।
"सात महीने? और तुम्हें लगता है ये काफी है?" अंकल का स्वर कड़ा था।
रिया ने बीच में बोला, "पापा, प्यार समय से नहीं नापा जाता। मैंने आरव में वो देखा है जो मुझे पूरा करता है। वो सम्मान देता है, सपोर्ट करता है।"
मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, "देखिए जी, लड़की खुश है।"
लेकिन अंकल अभी भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने आरव से कहा, "कल शाम मेरे ऑफिस आना। अकेले।"
आरव ने हामी भरी। रात को रिया के साथ वह काफी देर तक बात करता रहा। "अगर अंकल मना कर दें तो?"
"तो हम इंतजार करेंगे। लेकिन मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी," रिया ने दृढ़ता से कहा।
अगले दिन आरव अंकल के पुराने ऑफिस पहुँचा। अंकल ने उसे चाय दी और सीधे सवाल किया, "तुम रिया को कितना प्यार करते हो?"
आरव ने बिना झिझके जवाब दिया, "जितना अपनी सांसों को। वो मेरी जिंदगी का सबसे सुंदर हिस्सा है। मैं उसे कभी दुख नहीं पहुँचाना चाहता।"
अंकल ने कुछ देर चुप रहकर कहा, "देखो बेटा, आजकल के लड़के जल्दी वादे कर लेते हैं। लेकिन जिम्मेदारी लेना मुश्किल होता है। रिया हमारी इकलौती बेटी है।"
"मैं समझता हूँ। मुझे समय दीजिए। मैं खुद को साबित करूँगा।"
अंकल मुस्कुराए। "ठीक है। लेकिन अभी शादी की बात नहीं। पहले दोनों अपनी करियर संभालो। और हाँ, हर महीने एक बार परिवार के साथ डिनर।"
आरव ने राहत की सांस ली।
उस शाम रिया और आरव खंडाला घूमने गए। बारिश की बूँदों में दोनों भीगे। खंडाला के व्यू पॉइंट पर खड़े होकर रिया ने कहा, "आरव, मुझे लगता है अब हमारी कहानी असली मोड़ पर है।"
आरव ने उसे अपनी बाहों में लिया। "हाँ। और ये मोड़ सुंदर है।"
दोनों ने आगे के प्लान बनाए। रिया ने मुंबई का ऑफर रिजेक्ट कर दिया। आरव ने अपनी कंपनी में बेहतर प्रोजेक्ट लिया। वीकेंड पर दोनों पुणे के अलग-अलग कोनों में घूमते—पुणे विश्वविद्यालय के कैंपस, भांडारकर रोड की किताबों की दुकानें, और कभी-कभी मराठा साम्राज्य की पुरानी इमारतों के पास।
एक दिन रिया ने कहा, "आरव, मुझे एक सपना दिखा। हम दोनों एक छोटे से घर में, पुणे के बाहर, जहाँ से पहाड़ दिखते हों। तुम काम करते हो, मैं घर से फ्रीलांसिंग। और शाम को हम साथ चाय पीते हैं।"
आरव हँसा। "सपना तो पूरा होगा। लेकिन अभी तो हम दोनों को मेहनत करनी है।"
समय बीतता गया। सर्दियाँ आईं। पुणे की ठंड में दोनों ने साथ में लॉन्ग ड्राइव की। क्रिसमस पर दोनों ने ओशो पार्क के पास एक छोटे कैफे में केक काटा। न्यू ईयर की रात को किले की ऊँचाई पर खड़े होकर उन्होंने आगामी साल का स्वागत किया।
लेकिन जिंदगी हमेशा सीधी नहीं चलती।
मार्च में आरव की कंपनी में बड़े लेवल की छंटनी हुई। आरव का प्रोजेक्ट कैंसल हो गया। अचानक बेरोजगारी का डर सताने लगा। घर पर मम्मी-पापा भी चिंतित थे। आरव रिया को बताने से हिचकिचा रहा था।
रिया को जब पता चला, तो वह सीधे आरव के घर पहुँची।
"क्यों नहीं बताया?" उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन प्यार भी।
"डर लग रहा था कि तुम सोचोगी मैं कमजोर हूँ," आरव ने सिर झुकाकर कहा।
रिया ने उसके चेहरे को ऊपर उठाया। "हम साथ हैं ना? कमजोरी भी साथ बाँटनी होती है।"
उसने आरव को नया रिज्यूमे बनाने में मदद की। दोनों रोज इंटरव्यू की तैयारी करते। रिया अपनी सैलरी से कुछ खर्च संभालने लगी। एक महीने बाद आरव को एक बेहतर कंपनी में जॉब मिल गई—और वो भी पुणे में ही।
उस दिन दोनों ने कट्टे रोड पर घूमते हुए आइसक्रीम खाई। रिया ने कहा, "देखा? प्यार सिर्फ़ खुशियों में नहीं, मुश्किलों में साथ खड़ा होना भी है।"
आरव ने उसे गले लगाया। "तुम मेरी ताकत हो, रिया।"
अब कहानी आगे बढ़ रही थी। गर्मियाँ आईं। पुणे की गर्मी में भी दोनों का प्यार ठंडक बिखेर रहा था। रिया के पेरेंट्स अब आरव को बेटे की तरह मानने लगे थे। एक शाम अंकल ने खुद कहा, "बेटा, अब धीरे-धीरे शादी की तैयारी करो।"
आरव और रिया खुशी से झूम उठे।
लेकिन भाग 4 का आखिरी ट्विस्ट अभी बाकी था।
एक दिन रिया को उसके पुराने कॉलेज का दोस्त मिला। वो रिया को बताता रहा कि आरव की एक्स-गर्लफ्रेंड अभी भी पुणे में है और उसने रिया के बारे में कुछ गलत बातें फैलाई हैं। रिया पहले तो परेशान हुई, लेकिन फिर आरव से सीधे पूछ लिया।
आरव ने सब सच बताया। "हाँ, वो पुरानी बात थी। लेकिन अब मेरी जिंदगी में सिर्फ़ तुम हो।"
रिया ने विश्वास किया। "मुझे यकीन है। लेकिन अगली बार कोई भी बात छिपाना मत।"
दोनों ने मिलकर उस अफवाह को खत्म किया। प्यार में विश्वास सबसे बड़ा हथियार था।
जून की शुरुआत हो चुकी थी। पुणे फिर से हरा-भरा हो रहा था। आरव और रिया एक छोटे से अपार्टमेंट में शिफ्ट होने की प्लानिंग कर रहे थे। भविष्य अनिश्चित था, लेकिन साथ होने का यकीन था।
आरव ने एक शाम रिया को मराठा म्यूजियम के पास बुलाया। सूरज ढल रहा था। उसने जेब से एक छोटा सा रिंग बॉक्स निकाला।
"रिया, ये शादी का नहीं... अभी तो प्रॉमिस रिंग है। कि मैं हमेशा तुम्हारा साथ दूँगा। चाहे जो भी आए।"
रिया की आँखों में आँसू थे। उसने रिंग पहनी और आरव को गले लगा लिया।
"पुणे की ये प्रेम कहानी अब हमारी कहानी है, आरव।"
दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा। पुणे की रोशनीयों में उनकी कहानी जारी थी—अनंत, सुंदर और सच्ची।
भाग 5 का इंतजार रहेगा... अगर आप चाहें तो बताएं! ❤️
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